गुप्त साम्राज्य || Gupta Empire
उद्भव
मौर्य विघटन के बाद लम्बे समय तक भारत विभिन्न
राजवंशों के अधीन रहा। इस काल में कोई ऐसा राजवंश नहीं हुआ जो भारत को एक शासन के
सूत्र में बांध सके।
कुषाणों तथा सातवाहनों ने युद्ध में काफी हद तक
स्थिरता लेन का प्रयत्न किया। किन्तु वे असफल रहे।
कुषाणों के पतन के बाद से लेकर गुप्तों के उदय
के पूर्व का काल राजनैतिक दृष्टि से विकेंद्रीकरण तथा विभाजन का काल माना जाता है।
इस राजनीतिक संक्रमण को दूर करने के लिए भारत
के तीनों कोने से तीन
नए राजवंश का उदय हुआ। मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग में नाग शक्ति, दक्कन
में वाकाटक तथा पूर्वी भारत में गुप्त वंश के शासक उदित हुए।
कालांतर में तीनों राजवंश वैवाहिक सम्बन्ध में
बांध गए। आपसी द्वंद से अपनी शक्तियों का दमन करके इन्होने गुप्तों के नेतृत्व में भारत को एक शक्तिशाली
शासन प्रदान किया।
कुषाणों के उपरांत मध्य भारत का बड़ा हिस्सा
मुकुण्डों के आधिपत्य में आया और उन्होंने 250 ई. तक राज्य
किया, तत्पश्चात गुप्त शासन का अंत हुआ।
ऐतिहासिक अवलोकन के बाद ऐसा प्रतीत होता है की
गुप्त लोग कुषाणों के सामंत थे।
गुप्त लोगों के जन्म और निवास के बारे में कुछ
कहना संभव नहीं है। प्राम्भ में वे भूस्वामी थे और मगध के कुछ हिस्सों पर उनका
राजनीतिक अधिकार था।
संभवतः गुप्त शासकों के लिए बिहार की अपेक्षा
उत्तर प्रदेश अधिक महत्व वाला प्रांत था, क्योंकि आरंभिक गुप्त मुद्राएं और
अभिलेख मुख्यतः उत्तर-प्रदेश में पाए जाते हैं।
कीर्तिकौमुदी नाटक में लिच्छवियों के मलेच्छ
तथा चांदसेन (चन्द्रगुप्त प्रथम) को ‘फारस्कर’ कहा गया है।
चंद्र्गोमिन के ‘व्याकरण’
नामक
ग्रंथ में युद्धों को जर्ट अर्थात जाट कहा गया है।
गुप्तवंशीय लोग धारण गोत्र के थे। इसका उल्लेख
चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त के पूना ताम्रपत्र में मिलता है।
उसका पति रुद्रसेन द्वितीय वाकाटक वंश का था, जो वस्तुवृद्धि
गोत्र का ब्राह्मण था।
स्मृतियों में युद्ध शब्द को वैश्यों से जोड़ा
गया है।
युद्धों की उत्पत्ति के विषय में जितने मत दिए
गए हैं|, उनमे उनको ब्राह्मण जाति से सम्बंधित करने का मत कुछ तर्कसंगत प्रतीत
होता है।
अभिलेखीय साक्ष्योँ के आधार पर गुप्तों के आदि
पुरुष का नाम श्रीगुप्त था। गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त को ही माना जाता है।
250 ई.पू.
के आसपास श्री गुप्त ने अपने पुत्र घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया।
घटोत्कच ने महाराज की उपाधि धारण की।
गुप्त वंशावली मेँ गुप्त वंश के पहले शासक का
नाम चंद्रगुप्त प्रथम मिलता है। चंद्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण
की थी।
गुप्त वंश के महत्वपूर्ण शासक
चंद्रगुप्त प्रथम (319 ई. से 335
ई.)
चंद्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक
संस्थापक माना जाता है। यह गुप्त वंश का महत्वपूर्ण शासक था, जिसने
गुप्त वंश को एक साम्राज्य की प्रतिष्ठा प्रदान की।
उसने 319-20 ई. में गुप्त
वंश की शुरुआत की। उसने लिच्छवी की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर के अपने वंश
को राजनीतिक ओर सामाजिक सम्मान दिलाया। चन्द्रगुप्त प्रथम का शासन मगध और पूर्वी
उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों (साकेत और प्रयाग) तक सीमित था। वैशाली संभवतः उसके
राज्य में शामिल नहीं था।
गुप्त वंश मेँ चांदी के सिक्कोँ का प्रचलन इसी
ने कराया।
समुद्रगुप्त (335 ई. से 375
ई.)
समुद्रगुप्त गुप्त वंश का सबसे महत्वपूर्ण शासक
था। यह चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र था।
समुद्रगुप्त एक महान साम्राज्य निर्माता था।
उसने गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया।
समुद्रगुप्त की सामरिक विजयों का विवरण हरिषेण
के प्रयाग प्रशस्ति लेख में मिलता है।
आम तौर पर यह माना जाता है की उसने सम्पूर्ण
उत्तर भारत पर (आर्यावर्त) प्रत्यक्ष शासन किया।
उत्तर भारत के जिन नौ शासकों को समुद्रगुप्त ने
पराजित किया था, उनमे अहिच्छत्र के अच्युत, चम्पावती
के नागसेन तथा विदिशा के गणपति के नाम प्रमुख हैं।
समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के 12 शासकों को
पराजित किया। समुद्रगुप्त की दक्षिणापथ विजय को रोय्चौधारी ने धर्म विजय की संज्ञा
दी है।
समुद्रगुप्त के समकालीन बांकानरेश मेघवजे ने
उसके पर उपहारों सहित एक दूत मंडल भेजा था तथा गया में एक गढ़ बनवाने की अनुमति
मांगी थी।
प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त की
दिग्विजय का उद्देश्य ‘धरणिबन्ध’ था। उसके द्वारा
उत्तर भारत में अपनाई गयी नीति को प्रसभोद्धरण तथा दक्षिणापाठ में
ग्रहणमोक्षानुग्रह कहा गया है।
समुद्रगुप्त एक महँ सेनानायक और विजेता था। इस
कारण विन्सेंट ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा है।
अपनी विजयों के बाद समुद्रगुप्त ने अश्वमेघ
यग्य किया, जिसका परिचय उसके सिक्कों तथा उसके
उत्तराधिकारियों के अभिलेखों से प्राप्त होता है।
समुद्रगुप्त विजेता के साथ-साथ कवि, संगीतज्ञ
और विद्या का संरक्षक भी था। उसने महान बौद्ध विद्वान् वसुबंधु को संरक्षण भी
प्रदान किया था।
समुद्रगुप्त संगीत प्रेमी था। उसके सिक्कों पर
उसे वीणा बजाते भी दिखाया गया है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’
(380-412 ई.पू.)
समुद्रगुप्त के पश्चात उसका पुत्र चन्द्रगुप्त
द्वितीय गुप्त साम्राज्य का शासक बना। परन्तु विशाखदत्त कृत देवीचंद्र्गुप्त नामक
नाटक में समुद्रगुप्त और चन्द्रगुप्त द्वितीय के बीच एक दुर्बल रामगुप्त शासक के
अस्तित्व का भी पता चलता है।
देवीचंद्र्गुप्त नाटक के अनुसार चन्द्रगुप्त
द्वितीय समुद्रगुप्त को पदच्युत करके साम्राज्य के शासन पर बैठा।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर विजय के
पश्चात् विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। उसकी अन्य उपलब्धियां विक्रमांक और
परम्परागत थीं।
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को भारत के महानतम
सम्राटों में से एक माना जाता है, उसने अपने साम्राज्य का विस्तार
वैवाहिक संबंधों और विजय दोनों से किया। ध्रुवदेवी और कुबेरनागा उसकी दो पत्नियाँ
थीं।
दिल्ली स्थित महरौली से प्राप्त लौह स्तंभ से
जिस पर ‘चन्द्र’ का उल्लेख मिलता है, चन्द्रगुप्त
द्वितीय से सम्बंधित बताया जाता है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन उसकी विजयों के
कारण नहीं बल्कि कला और साहित्य के प्रति उसके अनुराग के कारण विख्यात है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय कला और साहित्य का महँ
संरक्षक था। उसके दरबार में विद्वानों की मंडली रहती थी, जिसे नवरत्न कहा
जाता था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में पाटलिपुत्र और
उज्जयिनी विद्या के प्रमुख केंद्र थे। उज्जयिनी विक्रमादित्य की दूसरी राजधानी थी।
चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में चीनी
यात्री फाह्यान भारत आया था। उसने अपने यात्रा वृतान्त में मध्य प्रदेश को
ब्राह्मणों का देश कहा है।
फाह्यान के यात्रा विवरण से चन्द्रगुप्त
द्वितीय के काल में शांति पूर्ण और सुखी जीवन की झांकी मिलती है। फाह्यान के
अनुसार अतिथि पराजय और दान पराजय हैं। लोगों में धार्मिक सहिष्णुता विद्यमान थी।
राज्य की ओर से उनमे किसी प्रकार का हस्तेक्षप नहीं किया जाता था।
चन्द्रगुप्त द्वितीय को नरेंद्र चंद्र, सिंहचंद्र,
देवराज,
देवगुप्त
और देव श्री भी कहा गया है।
चन्द्रगुप्त द्वितीय का शासन काल कला संस्कृति
और धर्म के लिए उन्नति का काल था।
साहित्यिक विकास की दृष्टि में चन्द्रगुप्त
द्वितीय अत्यंत समृद्ध था। कालिदास, अमरसिंह और धनवंत आदि उसके समकालीन थे,
जिन्होंने
महत्वपूर्ण रचनाओं का सृजन किया।
कालिदास, धनवंत, अपसक,
अमरसिंह,
शंकु,
वेताल,
भट्ट,
घटकपट,
वराहमिहिर,
वररूचि
जैसे विद्वान नवरत्नों में शामिल थे।
कुमारगुप्त (415 ई. से 454
ई.)
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के बाद कुमारगुप्त
साम्राज्य की गद्दी पर बैठा।
परन्तु कुमारगुप्त से पूर्व एक और शासक का नाम
आता है। वह शासक ध्रुवदेवी (रामगुप्त की पत्नी) का पुत्र गोविन्द गुप्त था। यह एक
विवादस्पद विषय है।
इसके सिक्कों पर सर्वप्रथम शिव-पार्वती को
पति-पत्नी के रूप में दर्शाया गया है।
गुप्त वंशावली के आधार पर अधिकांश इतिहासकार इस
मत से सहमत हैं की समुद्रगुप्त के उपरांत कुमारगुप्त की गुप्त वंश का शासक बना।
कुमारगुप्त के शासनकाल में मध्य काल में मध्य
एशिया के देशों की एक शाखा ने बैक्ट्रिया को जित लिया और उसके बाद हिन्दुकुश के
पहाड़ों से हूणों के आक्रमण का खतरा मंडराने लगा। लेकिन उसके शासन काल में गुप्त
सम्राज्य हूणों के खतरे से दूर ही रहा।
स्कंदगुप्त के भीतरी अभिलेखों से पता चलता है
की कुमारगुप्त के अंतिम दिनों में गुप्त साम्राज्य पर पुश्य्मित्रों का आक्रमण
हुआ। लेकिन उसने अपने पुत्र स्कंदगुप्त की सहायता से साम्राज्य को पुष्यमित्रों से
बचा लिया।
कुमारगुप्त के सिक्कों से पता चलता है कि उसने
अश्वमेघ यग्य किया। सुव्यवस्थित शासन का वर्णन उसके मंदसौर अभिलेख से मिलता है।
मंदसौर अभिलेख की रचना वत्समट्टि ने की थी।
कुमारगुप्त ने महेंद्रादित्य, श्रीमहेन्द्र
और महेंद्र कल्प की उपाधियाँ धारण की थी।
कुमारगुप्त के शासन काल में नालंदा
विश्वविद्यालय की की स्थापना हुई।
स्कंदगुप्त (455 ई. से 467
ई.)
कुमारगुप्त की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र
स्कंदगुप्त गुप्त साम्राज्य का शासक बना।
स्कंदगुप्त गुप्तवंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक
था। वह एक वीर और पराक्रमी योद्धा था।
इसके शासनकाल में हूणों (मलेच्छों) का आक्रमण
हुआ, लेकिन उसने अपने पराक्रम से हूणों को पराजित कर साम्राज्य की
प्रतिष्ठा स्थापित की।
हूणों पर स्कंदगुप्त की सफलता का उल्लेख जूनागढ़
अभिलेख से मिलता है।
स्कंदगुप्त का साम्राज्य कठियावाड़ से बंगाल तक
सम्पूर्ण उत्तरी भारत में फैला हुआ था। पश्चिम में सौराष्ट्र, कैम्बे,
गुजरात
तथा मालवा के भाग सम्मिलित थे।
स्कंदगुप्त एक योग्य सैन्य संचालक होने के साथ
ही एक कुशल प्रशासक भी था। उसने 466 ई. में चीनी सम्राट के दरबार में एक
राजदूत भेजा। इसके उसके सुदूर चीन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का भी पता चलता है।
इसने सौ राजाओं के स्वामी की भी उपाधि धारण की।
प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखते हुए उसने
अपनी राजधानी को अयोध्या स्थनान्तरित किया।
इसके शासन काल में आन्तरिक समस्याएं गठित होने
लगीं। सामंत अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गए थे। फिर भी वह गुप्त साम्राज्य
की शक्ति और प्रतिष्ठा कायम रखने में सफल रहा।
स्कंदगुप्त को कहौम स्तंभ लेख में ‘शक्रादित्य’
आर्यगंजु
श्री मूल कल्प में ‘देवरॉय’ तथा जूनागढ़
अभिलेख में ‘श्री परिक्षिपृवआ’ कहा गया है।
स्कंदगुप्त ने सुदर्श झील के पुनरुद्धार का
कार्य सौराष्ट्र के गवर्नर पर्यदत्त के पुत्र पत्रपालित को सौंपा था।
स्कंदगुप्त गुप्त साम्राज्य का अंतिम
महत्वपूर्ण शासक था। इसकी मृत्यु के बाद अनेक शासकों ने शासन किया लेकिन उसमे सबसे
अधिक शक्तिशाली शासक बुद्धगुप्त हुआ।
परवर्ती शासकों की कमजोरी का लाभ उठाकर एक ओर
सामंतों ने सर उठाना शुरू किया, दूसरी ओर हूणों के आक्रमण ने गुप्तों
की शक्ति को इतना कम कर दिया की स्कंदगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य को कायम नहीं
रखा जा सका।
हूणों का आक्रमण
बैक्ट्रिया
पर विजय प्राप्त करने के बाद हूणों ने कुमारगुप्त के समय भारत की और अपना
रुख किया।
तोरमाण हूणों का प्रथम शासक था। इसका उल्लेख
धन्यविस्यु के समय अभिलेख में मिलता है।
हूणों का भारत पर प्रथम आक्रमण स्कंदगुप्त के
समय हुआ, परन्तु उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।
हूणों का आक्रमण भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा से
प्रारंभ होकर मध्य भारत तक होता रहा।
तोरमाण के उपरांत उसके पुत्र मिहिरकुल ने भी
भारत पर आक्रमण जरी रखा।
मिहिरकुल को पराजित करने का श्रेय मालवा के
यशोवर्मन और गुप्तों के बाद मगध पर शासन करने वाले शासक नरसिंह गुप्त बालादित्य को
दिया जाता है।
राजनीतिक व्यवस्था
गुप्तों का शासन राजतंत्रात्मक व्यवस्था पर
आधारित था। शासन का सर्वोच्च अधिकारी सम्राट था।
सम्राट व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और
कार्यपालिका तीनों का प्रमुख था।
गुप्त काल में दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत
मान्य था, परन्तु यह पूर्वकाल की तरह लोकप्रिय नहीं रह गया था।
राजपद वंशानुगत था, परन्तु राजकीय
सत्ता ज्येष्ठाधिकार की प्रथा के आभाव के कारण सीमित थी।
गुप्तों की शासन व्यवस्था पूर्णतया मौलिक नहीं
थी। उसमें मौर्यों, सातवाहनों, शकों तथा
कुषाणों के प्रशासन की विधियों का समावेश था।
केन्द्रीय प्रशासन
केन्द्रीय प्रशासन का जो नियंत्रण मौर्य काल
में देखने को मिलता है, वह गुप्त काल में नहीं मिलता है।
राजा की सहायता के लिए केन्द्रीय स्तर पर
मंत्री और अमात्य होते थे।
मंत्रियों का चयन उनकी योग्यता के आधार पर किया
जाता था।
कामन्दक और कालिदास दोनों ने मंत्रिमंडल या
मंत्रिपरिषद का उल्लेख किया है।
कामन्दक नीतिसार में मंत्रियों और अमात्यों के
बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है।
कात्यायन स्मृति में इस बात पर जोर दिया गया है
कि अमात्यों की नियुक्ति ब्राह्मण वर्ग में होनी चाहिए।
गुप्त साम्राज्य के सबसे बड़े अधिकारी
कुमारामात्य होते थे।
सम्राट द्वारा जो क्षेत्र स्वयं शासित होता था।
उसकी सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई देश थी। देश के प्रशासक को ‘गोप्ता’ कहा
जाता था। जूनागढ़ अभिलेख में में सौराष्ट्र को एक ‘देश’ कहा
गया है।
साम्राज्य का केन्द्रीय प्रशासन अनेक विभागों
में विभक्त था, जिसका उत्तरदायित्व विभिन्न अधिकारीयों को
सौंपा गया था।
केन्द्रीय शासन के विविध विभागों को ‘अधिकरण’
कहा
जाता था। प्रत्येक अधिकरण की अपनी मुद्रा होती थी। केन्द्रीय अधिकारियों को नकद
वेतन दिया जाता था।
प्रांतीय शासन
शासन की सुविधा के लिए गुप्त साम्राज्य को
विभिन्न प्रान्तों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘मुक्ति’
कहा
जाता था।
प्रांतीय शासकों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की
जाती थी, जिन्हें उपरिक, गोप्ता, मोगपति तथा
राजस्थानीय कहा जाता था।
प्रांतीय शासन के समस्त कार्यों का
उत्तरदायित्व प्रांतीय शासक पर होता था। उनके उत्तरदायित्व केंद्र के शासकीय
पदाधिकारियों के सामानांतर थे।
उप्रिकों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती
थी। इस पद पर राजदुल के कुमारों की नियुक्ति की जाती थी।
प्रांतीय शासन के कई अन्य अधिकारियों और
कर्मचारियों का भी उल्लेख मिलता है। ‘बलाधिकराजिक’ सैनिक कोष का
अधिकारी था।
‘विनयस्थिति स्थापक’ विधि एवं
व्यवस्था मंत्री था। ‘अटाश्वपति’ पैदल और घुडसवार
सेना का अधिपति था। जबकि ‘महापिल्लुपति’ हाथी सेना का
अधिकारी था।
जिला प्रशासन
नियुक्तियों का विभाजन अनेक जिलों में किया गया
था। इन जिलों को विषय कहा जाता था। इसकी नियुक्ति उपरिक द्वारा की जाती थी।
विषयपति की सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक
विषयपरिषद् होती थी, जिसकी नियुक्ति प्रायः पांच वर्ष के लिए की
जाती थी।
विषय परिषद् के सदस्य विषय महत्व कहलाते थे।
इनमें सार्थवाह, प्रथम कुलिक और प्रथम कायरथ शामिल थे।
स्थानीय प्रशासन
गुप्त साम्राज्य में स्थानीय प्रशासन को दो
भागों में बांटा गया था- 1. नगर प्रशासन 2. ग्राम प्रशासन।
नगर प्रशासन के प्रमुख पदाधिकारियों को पुरपाल,
नगरअक
या द्रांगिक कहा जाता था। यह नगर परिषद् की सहायता से समस्त समस्त नागरिक सुविधाओं
तथा सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था।
नगर परिषद् के प्रमुख को ‘नगरपति’
कहा
जाता था। अवस्थिक नामक कर्मचारी धर्मशालाओं के पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करते
थे।
गुप्त काल में ग्राम, प्रशासन की सबसे
छोटी इकाई थी। प्रत्येक विषय के अंतर्गत कई ग्राम होते थे।
ग्राम और विषय के मध्य एक और इकाई के अस्तित्व
का साक्ष्य मिलता है। इसे ‘पेय’ कहा जाता था।
पेय कई ग्रामों का एक समूह था।
ग्राम प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी ग्रामपति या
ग्रामिक था। उसकी सहयता के लिए एक ग्राम पंचायत थी।
इस ग्राम सभा को मध्य भारत में ‘पंचमजुली’,
तथा
बिहार में ग्राम जनपद कहा जाता था।
न्याय व्यवस्था
गुप्त काल में न्याय व्यवस्था का समुचित प्रबंध
किया गया था।
गुप्तकाल में न्यायालय के चार वर्ग थे- 1.
राजा
का न्यायालय 2. पूग 3. श्रेणी 4. हुल।
दण्डविधान कठोर था।दण्डनायक, सर्वदण्डनायक
और महादण्डनायक न्यायाधीश थे।
निम्न स्तर पर न्यायिक मामलों का निपटारा समिति,
परिषदें
तथा संस्थाएं भी करती थीं।
मंत्री और पुरोहित भी न्यायायिक मामलों में
सहायता करते थे।
सामाजिक व्यवस्था
गुप्तकालीन समाज पम्परागत चार वर्गों अर्थात,
ब्राह्मण,
क्षत्रिय,
वैश्य
तथा शूद्र में विभक्त था।
इस काल की वर्ग व्यवस्था की विशेषता यह थी की
अब शूद्र सैनिक वृत्ति अपनाने लगे थे।
ह्वेनसांग के विवरण से विदित होता है की मतिपुर
का राजा शूद्र था।
समाज में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था।
ब्राह्मणों के 6 कर्तव्य माने जाते थे- अध्ययन, अध्यापन,
यज्ञ
करना, दान देना एवं दान लेना।
न्याय संहिताओं में कहा गया है की ब्राह्मण की
परीक्षा तुला से, क्षत्रिय की अग्नि से, वैश्य की जल से
तथा शूद्र की विष से की जानी चाहिए।
इस काल के ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि,
ब्राह्मण
को शूद्र का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि इससे अध्यात्मिक बल घटता है।
मनु के अनुसार दास वर्षीय ब्राह्मण सौ वर्षीय
क्षत्रिय से श्रेष्ठ था। ब्राह्मण एवं क्षत्रिय क्रमशः पिता और पुत्र तुल्य थे।
नृसिंह पूरण में कृषि को शूद्र का कर्म बताया
गया है। अमरकोश में शिल्पियों को शूद्र वर्ग में स्थान दिया गया है।
गुप्त काल में कायस्थ जाति का उदय हुआ। कायस्थ
प्रारंभ में लिपिक का कार्य करने वाले लोग थे, जो आगे चलकर एक
जाति के रूप में विकसित हो गए।
नारद ने 15 प्रकार के
दासों का उल्लेख किया है। फाह्यान के अनुसार अछूत नगर एवं बाज़ार से बाहर इकटठे थे।
मंद्स्मृति में दासों के सेनापति विषयक अधिकारों की पर्याप्त चर्चा है।
गुप्त काल में स्त्रियों की स्थिति में गिरावट
आयी। सामान्यतः 12-13 वर्ष की आयु में कद्कियों की शादी कर दी जाती
थी।
स्मृतियों में लड़कियों के पुनयन तथा वेदाचयन का
निषेध किया गया था। देवदासी प्रथा का प्रचलन था।
इस काल में विधवाओं की स्थिति अत्यंत सोचनीय
थी।। हालाँकि नारद एवं परामर्श स्मृति में विधवा विवाह का वर्णन मिलता है।
गुप्तकाल में सटी प्रथा की शुरुआत मणि जाती है,
क्योंकि
सटी प्रथा का पहले अभिलेख प्रमाण 510 ई. के भानुगुप्त के अभिलेख से मिलता
है।
गुप्तकालीन साहित्य एवं कला में नारी का
आदर्शमयचित्रण है परंतुव्य्व्हारिक रूप में उनकी स्थिति पहले किए अपेल्षा दयनीय हो
गयी थी।
गौतम ने वैश्य पुरुष और शूद्र स्त्री की संतान
को ‘उग्र’ कहा है। स्मृतियों के अनुसार क्षत्रिय पुरुष और
शुद्र स्त्री की संतान को भी ‘उग्र’ कहा गया है।
स्म्रितिउओन में अत्यंज तथा चांडालों
(अस्पृश्यों) को प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न बताया गया है।
आर्थिक व्यवस्था
गुप्त काल आर्थिक दृष्टि से सम्पन्नता का काल
था। इस काल के लोगों का जीवन समृद्धि से परिपूर्ण था।
गुप्तकाल के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।
वृहद्संहिता में तीन फसलों की जानकारी मिलती है।
इत्सिंग के अनुसार चावल और जौ मुख्य फसलें थीं।
कालिदास ने ईख और धान की खेती का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन परम्परा के अनुसार राजा भूमि का मालिक
होता था। वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन का 1/6 भाग का अधिकारी
था। राजकीय आय का मुख्य स्रोत भूमिकर था।
गुप्त काल के कुछ प्रमुख कर इस प्रकार हैं-
उपयुक्त मुख्य करों के अतिरिक्त हिरण्य,
प्रणय,
आदि
जैसे अन्य करों का भी उल्लेख मिलता है।
करों की अदायगी हिरण (नकद) तथा ‘मेय’
(अन्न
के तौल) दोनों ही रूपों\ में की जा सकती थी
अमरकोष में 12 प्रकार के भूमि
कर का उल्लेख मिलता है।
सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण स्कंदगुप्त के
जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है। सिंचाई के लिए रहट या घट्टी यंत्र का प्रयोग होता था।
गुप्त शासकों ने सबसे अधिक स्वर्ण सिक्के जारी
किये थे। सोने के सिक्कों को गुप्त अभिलेखों में दीनार कहा गया है।
चांदी के सिक्कों का प्रयोग स्थानीय लेन-देन
में किया जाता था।
गुप्तकाल की व्यापारिक गतिविधियों के बारे में
श्रेणियों की मुहरों आदि से जानकारी मिलती है।
व्यापारियों की एक समिति होती थी, जिसे
नियम कहा जाता था। नियम के प्रधान को श्रेष्ठि कहा जाता था। व्यापारियों के समूह
को सार्थ तथा उनके मुखिया को सार्थवाह कहा जाता था।
नगर श्रेष्ठिन बैंकरों एवं साहूकारों के रूप
में कार्य करते थे।
मंदसौर अभिलेख से पता चलता है, की
रेशम बुनकरों की श्रेणी ने एक भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
वस्त्र उद्योग गुप्त काल का एक प्रमुख उद्योग
था। अमरकोश में कटाई, बुनाई, हथकरघा, धागे इत्यादि का
सन्दर्भ आया है।
गुप्तकाल में विदेशों से भी व्यापारिक सम्बन्ध
थे। इनमे वेजेन्टाईन साम्राज्य तथा चीन प्रमुख थे।
विदेशों को निर्यात की जाने वाली सर्वाधिक
महत्वपूर्ण वस्तुओं में मसाले और रेशम थे।
कला और साहित्य
गुप्तकालीन शासन की सबसे बड़ी व्यवस्था की सबसे
बड़ी उपलब्धि कला और साहित्य की माना जाता है।
कला और साहित्य के अप्रतिम विकास के आधार पर ही
भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को ‘स्वर्णयुग’ कहा गया है।
गुप्तकाल में ही सम्पूर्ण मंदिर निर्माण कला का
जन्म हुआ। शिखर युक्त मंदिरों का निर्माण गुप्तकला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता
थी।
गुप्त मूर्ति कला के सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ
की मूर्तियाँ हैं, और चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजंता
बौद्ध कला के उदाहरण हैं। गुप्तकालीन मूर्तियों की बनावट, भाव भंगिमा और
कलात्मकता निःसंदेह अतुलनीय है।
साहित्य की दृष्टि से गुप्त काल अत्यंत समृद्ध
था।
कालिदास ने युगांतरकारी साहित्य की रचना से
गुप्तकाल को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाया है।
कुमारसंभव, मेघदूत, ऋतुसंहार
और अभिज्ञानशाकुन्तलम जैसी कालजयी कृतियों की रचना गुप्तकाल में ही हुईं थीं।
पुराणों तथा नारद कात्यारान, पराशर,
वृहस्पति
आदि स्मृतियों की रचना भी गुप्तकाल में ही हुई।
विज्ञान के क्षेत्र में भी साहित्य का सृजन
हुआ। ब्रह्मसिद्धांत, आर्यभिटयम और सूर्यसिद्धान्त की रचना करने वाले
आर्यभट्ट थे।
कामंदक ने ‘नीतिसार’
और
वात्सायन में कामसूत्र की रचना गुप्तकाल में ही की।
विष्णु शर्मा द्वारा रचित ‘पंचतंत्र’
गुप्तकालीन
साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नमूना है।
यास्क कृत
‘निघतु’ निरुक्त से वैदिक साहित्य के अध्ययन में सहायता
मिलती है। भट्टी, भौमक आदि व्याकरण के विद्वान् थे।
इस काल में बौद्ध साहित्य की भी रचना हुई,
बुद्धघोष
में सुमंगलविलासिनी की रचना की। इसके अतिरिक्त ‘लंकावतारसूत्र’
‘महायानसूत्र’
‘स्वर्णप्रभास’
आदि
बौद्ध कृतियों की रचना की गयी।
जैनाचार्य सिद्धसेन ने तत्वानुसारिणी
तत्वार्थटीका नामक ग्रन्थ की रचना की।
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