मौर्य युग का पतन || The Fall of Mauryan Era
अशोक के उत्तराधिकारी
अशोक की मृत्यु
के
उपरांत
मौर्य
साम्राज्य
का
इतिहास
अत्यंत
तिमिरावृत्त
हो
जाता
है।
उसके
उत्तराधिकारियों
का
जो
विवरण
बौद्द्द, जैन, ब्राहमण
ग्रंथों
में
में
मिलता
है, वह
इतना
अस्पष्ट
और
परस्पर-विरोधी
हैं
कि
उसके
आधार
पर
मौर्य
साम्राज्य
के
परिवर्ती
इतिहास
का
निर्माण
करना
अतीव
दुष्कर
कार्य
प्रतीत
होता
है।
इतना
निश्चित
है
कि
अशोक
के
बाद
मौर्य
साम्राज्य
की
शक्ति
दिनोंदिन
गिरती
ही
गई।
ऐसा
एक
भी
प्रतापी
और
पराक्रमी
नरेश
नहीं
हुआ
जो
पतन
की
इस
तीव्रगामी
प्रक्रिया
को
रोककर
अपने
वंश
के
गौरव
को
प्रतिष्ठित
करता।
परिणाम
यह
हुआ
कि
पराक्रमी
चन्द्रगुप्त
मौर्य
द्वारा
स्थापित
साम्राज्य
शीघ्र
ही
ध्वस्त
हो
गया।
अशोक के पाँच
पुत्रों
का
उल्लेख
विभिन्न
स्रोतों
में
किया
गया
है।
इनके
नाम
हैं-
कुणाल, तीवर, महेन्द्र, कुस्तन
और
जालौक।
इनमें
से
अशोक
के
में
परस्पर
काफी
अन्तर
है।
दिव्यावदान
के
अनुसार
अशोक
के
बाद
कुणाल
का
पुत्र
सम्पदी
या
सम्प्रति
राजा
हुआ।
वायु
पुराण
का
साक्ष्य
है
कि
अशोक
के
राजसिंहासन
का
उत्तराधिकारी
उसका
पुत्र
कुणाल
हुआ
जिसने
आठ
वर्षों
तक
शासन
किया।
किन्तु
एक
अन्य
अनुश्रुति
उसे
अन्धा
बतलाती
है।
कहा
जाता
है
कि
उसके
नेत्रों
की
सुन्दरता
के
कारण
उसका
नाम
कुणाल
पड़ा
था
और
अपनी
विमाता
तिष्परक्षिता
की
ईष्य
के
कारण
उसे
अपने
नेत्रों
से
हाथ
धोना
पड़ा
था।
यदि
वह
अन्धा
था
तो
सम्भवत:
उसकी
स्थिति
महाभारत
के
धृतराष्ट्र
की
सी
थी
और
यद्यपि
वह
सम्राट्
समझा
जाता
था
तब
भी
उसकी
शक्ति
नाम
मात्र
की
ही
थी।
शारीरिक
दृष्टि
से
अयोग्य
होने
के
कारण
राज्य-भार
उसके
प्रिय
पुत्र
सम्प्रति
को
दे
दिया
गया
जिसको
बौद्ध
और
जैन
लेखों
ने
अशोक
का
उत्तराधिकारी
बतलाया
है।
कुणाल के उत्तराधिकारियों
के
विषय
में
भी
अनुश्रुतियाँ
परस्पर-विरोधी
बातें
कहती
हैं।
वायु
पुराण
के
अनुसार
अशोक
का
पुत्र
बन्धुपालित
था।
दिव्यावदान
तथा
जिनप्रभसूरि
के
पाटलिपुत्र
कल्प
के
अनुसार
वह
सम्पदी
या
सम्प्रदी
या
सम्प्रती
था
और
तारानाथ
के
अनुसार
विगतशोक-महान्
सम्राट्
अशोक
का
पुत्र
था।
या
तो
ये
राजकुमार
एक
ही
व्यक्ति
थे
अथवा
ये
भाई
थे।
यदि
भाई
होने
वाला
सिद्धान्त
ठीक
हो
तो
बन्धुपालित
का
समीकरण
दशरथ
के
साथ
किया
जा
सकता
है।
दशरथ
की
ऐतिहासिकता
के
प्रमाण
उपलब्ध
हैं।
दशरथ
की
प्रवृत्ति
धर्म
की
ओर
अधिक
थी।
उसने
नागार्जुनी
की
पहाड़ियों
में
आजीविकों
के
लिए
कन्दरा-गृहों
का
निर्माण
करवाया
था।
इससे
मालूम
पड़ता
है
कि
इस
समय
भी
आजीविकों
का
सम्प्रदाय
विद्यमान
था।
दशरथ
के
समय
में
मगध
साम्राज्य
से
कलिंग
का
प्रान्त
पृथक
हो
गया
था।
अभिलेखों
में
अशोक
की
भाँति
दशरथ
के
लिए
भी
देवानांपिय
की
उपाधि
का
प्रयोग
किया
गया
है।
दशरथ
सम्भवत:
पुत्रहीन
था, अतएव
उसका
भाई
सम्प्रति
उसका
अधिकारी
हुआ।
सम्प्रति
का
नाम
अधिकांश
पौराणिक
वंशावलियों
में
आता
है।
इसके
अतिरिक्त
जैन
तथा
बौद्ध
लेखकों
ने
भी
उसका
उल्लेख
किया
है।
अतएव
सम्प्रति
को
भी
ऐतिहासिक
मगध
का
शासक
मानना
समीचीन
जान
पड़ता
है।
अशोक
के
बाद
मौर्य
वंश
में
जितने
भी
शासक
हुए, उनमें
सबसे
महत्त्वपूर्ण
सम्प्रति
ही
था।
उसने
मगध
के
सभी
भागों
पर
अपना
अधिकार
बनाये
रखा।
डॉ.
स्मिथ
का
कथन
है
कि
दशरथ
और
सम्प्रति
एक
ही
मगध
में
पश्चिमी-पूर्वी
भारत
में
शासन
कर
रहे
थे।
स्मिथ
साहब
के
कथनानुसार
अशोक
के
बाद
मौर्य
साम्राज्य
दो
भागों
में
विभक्त
हो
गया
था।
परन्तु
अनेक
विद्वानों
को
स्मिथ
की
यह
धारणा
मान्य
नहीं
है।
सम्भवत:
सम्प्रति
ने
दो
राजधानियों
का
प्रयोग
किया
था।
उसकी
एक
राजधानी
पाटलिपुत्र
और
दूसरी
अवन्ति
में
थी।
जैन
ग्रन्थों
में
सम्प्रति
को
सम्पूर्ण
भारत
का
राजा
कहा
गया
है।
बौद्ध
अनुश्रुति
में
जो
स्थान
अशोक
का
है
वही
जैन
अनुश्रुति
में
सम्प्रति
का
है।
सम्प्रति
ने
जैन
धर्म
को
राजाश्रय
प्रदान
किया
था
और
जिनप्रभसूरि
के
अनुसार
वह
एक
महान्
अर्हन्त
था
जिसने
अनार्य
देशों
में
भी
श्रमणों
के
लिए
विहार
बनवाये
थे।
सम्प्रति के बाद
मौर्य
वंश
का
इतिहास
और
भी
अधिक
अन्धकारमय
है।
किन्तु
सम्भवत:
यह
बात
ठीक
जान
पड़ती
है
कि
बृहद्रथ
मौर्य
वंश
का
अन्तिम
सम्राट्
था।
यह
विलासी
और
अकर्मण्य
था
और
सेना
के
सम्पर्क
से
सर्वथा
विलग
रहता
था।
फलत:
उसके
सेनापति
पुष्यमित्र
शुंग
ने
सेना
के
सामने
ही
उसका
वध
कर
दिया
और
मौर्य-
साम्राज्य
पर
अपना
अधिकार
स्थापित
कर
लिया।
मौर्य युग का
पतन
भारतीय इतिहास में
मौर्य
युग
का
अपना
महत्त्व
है।
मौर्य
युग
में
प्रथम
बार
भारत
को
सशक्त
राजनैतिक
एकता
से
बाँधने
का
प्रयास
किया
गया।
मौर्य
युग
के
लिए
सुविख्यात
है।
उसे
चन्द्रगुप्त
मौर्य
जैसे
सम्राट्, चाणक्य
जैसे
कूटनीतिज्ञ
तथा
सम्राट्
अशोक
जैसे
लोक
कल्याणकारी
शासक
मिले।
मौर्य
युग
से
ही
भारत
के
क्रमबद्ध
राजनैतिक
इतिहास
का
प्रारम्भ
होता
है।
मौर्य
युग
में
धर्म, दर्शन, साहित्य, कला
इत्यादि
के
क्षेत्र
में
अनेक
कीर्तिमान
स्थापित
किए।
किन्तु
कतिपय
कारणों
से
मौर्य
साम्राज्य
भी
इतिहास
की
सामग्री
बनकर
अतीत
की
गर्त्त
में
चला
गया।
इतिहासकारों ने अपनी-अपनी
दृष्टि
से
मौर्य
साम्राज्य
के
पतन
के
कारणों
प्रकाश
धाता
है।
संक्षेप
में
का
कारण
की
स्थितिखत
रूप
में
रख
सकते-
सुयोग्य शासकों का अभाव
किसी भी
साम्राज्य
के
पतन
में
उसके
शासकों
की
प्रमुख
भूमिका
रहती
है।
मौर्य
साम्राज्य
के
साथ
भी
ऐसा
ही
हुआ।
मौर्य
साम्राज्य
के
अन्तिम
चरण
में
सुयोग्य
शासकों
का
अभाव
हो
गया।
सम्राट्
अशोक
के
उत्तराधिकारी
इतने
विशाल
साम्राज्य
की
रक्षा
करने
में
सर्वथा
अक्षम
निकले।
फलत:
साम्राज्य
निर्धारित
होता
गया।
केन्द्र में
सक्षम
और
सशक्त
सजा
के
अभाव
के
विभाजन
और
विघटन
का
मार्ग
प्रशस्त
किया।
अशोक की धम्म नीति
अशोक की
धम्म
नीति
ने
भी
परिणामों
का
साम्राज्य
पर
विपरीत
प्रभाव
पड़ा।
अशोक
बौद्ध
धर्म
का
तथा
उसके
उत्तराधिकारी
जैन
धर्म
का
अनुयायी
था।
इनकी
धार्मिक
नीतियों
के
कारण
साम्राज्य
की
सैनिक
शक्तियों
पर
प्रतिकूल
प्रभाव
पड़ा।
इन
धर्मों
की
अहिंसा
की
नीति
ने
साम्राज्य
की
रक्षा-रचना
को
कमजोर
बना
दिया।
इसी
आधार
पर
महामहोपाध्याय
हर
प्रसाद
शास्त्री
ने
मौर्य
साम्राज्य
के
पतन
का
मुख्य
कारण
सम्राट्
अशोक
की
नीतियों
को
ठहराया
है।
हर
प्रसाद
शास्त्री
ने
उस
सम्बन्ध
में
अपने
निम्नलिखित
तर्क
प्रस्तुत
किए
हैं-
अशोक ने
साम्राज्य
विस्तार
के
स्थान
पर
शान्ति, अहिंसा
और
धर्म-विजय
की
नीति
अपनाई।
धर्म प्रचार
में
लगे
रहने
के
कारण
उनका
शासन
दुर्बल
पड़
गया।
ब्राह्मण वर्ग अशोक की नीतियों से असन्तुष्ट
साम्राज्य ब्राह्मण
प्रतिक्रिया
का
शिकार
हुआ
क्योंकि
ब्राह्मण
वर्ग
अशोक
की
नीतियों
से
असन्तुष्ट
था।
विकेन्द्रीकरण की
नीति
बढ़ने
लगी।
अशोक की
दानशीलता
के
कारण
राज्य-कोष
खाली
हो
गया।
अशेाक की
धार्मिक
नीतियों
के
कारण
सैन्य
कौशल
का
ह्रास
हुआ।
कुछ विद्वान ने
अशोक
की
नीतियों
को
ब्राह्मण
विरोधी
कहा
है
और
उसे
मौर्य
साम्राज्य
के
पतन
का
मुख्य
कारण
बताया
है।
किन्तु उधर
दूसरी
ओर कुछ विद्वान ने
हर
प्रसाद
शास्त्री
के
तकों
का
खण्डन
किया
है
और
कहा
है
कि
अशोक
की
अहिंसा
की
नीति
को
साम्राज्य
के
पतन
का
कारण
नहीं
ठहराया
जा
सकता।
मौलिक कारण
मौर्य
साम्राज्य
के
पतन
की
संतोषजनक
व्याख्या
इन
शब्दों
में
नहीं
की
जा
सकती
कि
सैनिक
निष्क्रियता, ब्राह्मण
प्रतिक्रिया, लोकप्रिय
विद्रोह, आर्थिक
दबाव
आदि
के
कारण
साम्राज्य
का
पतन
हो
गया।
पतन
के
मौलिक
कारण
थे।
जिनके
कारण
साम्राज्य
का
पतन
हो
गया।
पतन
के
कारण
मौलिक
थे
जिनका
मौर्यकालीन
जीवन
से
गहरा
सम्बन्ध
था?
संक्षेप में
हम
यह
कह
सकते
हैं
कि
कमजोर
उत्तराधिकारी, केन्द्रीय
सत्ता
का
अभाव, प्रांतीय
शासकों
का
अत्याचार, करों
की
अधिकता, विदेशी
आक्रमण
तथा
देश
में
राष्ट्रीय
भावना
का
अभाव
और
अशोक
की
नीति
मौर्य
साम्राज्य
के
प्रमुख
कारण
थे।
अन्त
में
हम
कह
सकते
हैं-
अप्रवासियों
का
सफल
विद्रोह, यूनानियों
का
मगध
साम्राज्य
में
दूर
तक
सफल
आक्रमण
तथा
उत्तर-पश्चिम
के
प्रान्तों
का
अलग
हो
जाने
के
कारण
मौर्य
साम्राज्य
के
पतन
का
कारण
है
तो
भारत
को
इसके
लिए
पश्चाताप
करने
की
आवश्यकता
नहीं
है।
यदि
अशोक
अपने
पितामह
की
भाँति
रक्तपात
की
नीति
का
अनुसरण
करता
तो
भी
उसके
साम्राज्य
का
कुछ
समय
पूर्व
या
पश्चात्
अंत
होना
ही
था
और
बृहद्रथ
के
समय
में
पुष्यमित्र
शुंग
ने
मौर्य
सम्राट्
का
वध
करके
राजसिंहासन
पर
अपना
अधिकार
जमा
लिया।
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