गुप्तकालीन आर्थिक व्यवस्था || Gupta Empire Economic System
गुप्त काल आर्थिक दृष्टि से सम्पन्नता का काल था। इस काल के लोगों का जीवन समृद्धि से परिपूर्ण था।
गुप्तकाल के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। वृहद्संहिता में तीन फसलों की जानकारी मिलती है।
इत्सिंग के अनुसार चावल और जौ मुख्य फसलें थीं। कालिदास ने ईख और धान की खेती का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन परम्परा के अनुसार राजा भूमि का मालिक होता था। वह भूमि से उत्पन्न उत्पादन का 1/6 भाग का अधिकारी था। राजकीय आय का मुख्य स्रोत भूमिकर था।
गुप्त काल के कुछ प्रमुख कर इस प्रकार हैं-
उपयुक्त मुख्य करों के अतिरिक्त हिरण्य, प्रणय, आदि जैसे अन्य करों का भी उल्लेख मिलता है।
करों की अदायगी हिरण (नकद) तथा ‘मेय’ (अन्न के तौल) दोनों ही रूपों\ में की जा सकती थी
अमरकोष में 12 प्रकार के भूमि कर का उल्लेख मिलता है।
सिंचाई का सर्वोत्तम उदाहरण स्कंदगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है। सिंचाई के लिए रहट या घट्टी यंत्र का प्रयोग होता था।
गुप्त शासकों ने सबसे अधिक स्वर्ण सिक्के जारी किये थे। सोने के सिक्कों को गुप्त अभिलेखों में दीनार कहा गया है।
चांदी के सिक्कों का प्रयोग स्थानीय लेन-देन में किया जाता था।
गुप्तकाल की व्यापारिक गतिविधियों के बारे में श्रेणियों की मुहरों आदि से जानकारी मिलती है।
व्यापारियों की एक समिति होती थी, जिसे नियम कहा जाता था। नियम के प्रधान को श्रेष्ठि कहा जाता था। व्यापारियों के समूह को सार्थ तथा उनके मुखिया को सार्थवाह कहा जाता था।
नगर श्रेष्ठिन बैंकरों एवं साहूकारों के रूप में कार्य करते थे।
मंदसौर अभिलेख से पता चलता है, की रेशम बुनकरों की श्रेणी ने एक भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था।
वस्त्र उद्योग गुप्त काल का एक प्रमुख उद्योग था। अमरकोश में कटाई, बुनाई, हथकरघा, धागे इत्यादि का सन्दर्भ आया है।
गुप्तकाल में विदेशों से भी व्यापारिक सम्बन्ध थे। इनमे वेजेन्टाईन साम्राज्य तथा चीन प्रमुख थे।
विदेशों को निर्यात की जाने वाली सर्वाधिक महत्वपूर्ण वस्तुओं में मसाले और रेशम थे।
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