गुप्तकालीन कला और साहित्य || Gupta Empire Art and Literature


गुप्तकालीन शासन की सबसे बड़ी व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि कला और साहित्य की माना जाता है।

कला और साहित्य के विकास के आधार पर ही भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को स्वर्णयुग’ कहा गया है।

गुप्तकाल में ही सम्पूर्ण मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ। शिखर युक्त मंदिरों का निर्माण गुप्तकला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता थी।

गुप्त मूर्ति कला के सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ की मूर्तियाँ हैंऔर चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजंता बौद्ध कला के उदाहरण हैं। गुप्तकालीन मूर्तियों की बनावटभाव भंगिमा और कलात्मकता निःसंदेह अतुलनीय है।

साहित्य की दृष्टि से गुप्त काल अत्यंत समृद्ध था।

कालिदास ने युगांतरकारी साहित्य की रचना से गुप्तकाल को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाया है।

कुमारसंभवमेघदूतऋतुसंहार और अभिज्ञानशाकुन्तलम जैसी कालजयी कृतियों की रचना गुप्तकाल में ही हुईं थीं।

पुराणों तथा नारद कात्यारानपराशरवृहस्पति आदि स्मृतियों की रचना भी गुप्तकाल में ही हुई।

विज्ञान के क्षेत्र में भी साहित्य का सृजन हुआ। ब्रह्मसिद्धांतआर्यभिटयम और सूर्यसिद्धान्त की रचना करने वाले आर्यभट्ट थे।

कामंदक ने नीतिसार’ और वात्सायन में कामसूत्र की रचना गुप्तकाल में ही की।

विष्णु शर्मा द्वारा रचित पंचतंत्र’ गुप्तकालीन साहित्य का सर्वोत्कृष्ट नमूना है।

यास्क कृत  निघतु’ निरुक्त से वैदिक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। भट्टीभौमक आदि व्याकरण के विद्वान् थे।

इस काल में बौद्ध साहित्य की भी रचना हुईबुद्धघोष में सुमंगलविलासिनी की रचना की। इसके अतिरिक्त लंकावतारसूत्र’ ‘महायानसूत्र’ ‘स्वर्णप्रभास’ आदि बौद्ध कृतियों की रचना की गयी।

जैनाचार्य सिद्धसेन ने तत्वानुसारिणी तत्वार्थटीका नामक ग्रन्थ की रचना की।