मोहम्मद
बिन कासिम Muhammad Bin Qasim
इसके
बाद भी कई आक्रमण हुए, अरब पराजयों से हतोत्साहित नहीं हुए थे। आठवीं सदी के प्रारंभिक चरण
में इब्न-अल-हरीअल विहिट्टी के सेनापतित्व में भयानक हमला हुआ जिसके फलस्वरूप
मकरान (आधुनिक बलोचिस्तान) उसके हाथ में आ गया। उम्मैया वंश के नेतृत्व में खिलाफत
राज्य बहुत शक्तिशाली हो गया था। ईराक के गवर्नर अल हज्जाज में विजय का अत्याधिक
उत्साह था। उसे खलीफा का भी समर्थन प्राप्त था। उसने सिंध में देवल के लुटेरों को
दंडित करने के लिए सेना भेजी, जिन्होंने बहुमूल्य उपहारों से भरे हुए आठ जहाजों को लूटा था। ये
उपहार लंका के राजा द्वारा खलीफा और हज्जा को भेजे गये थे। सिंध के शासक दाहिर पर
लगातार दो हमले हुए, दोनों बार सेनापतियों को पराजय मिली। हज्जाज इस पराजय से अपमानित हुआ
और सिंधियों से बदला लेने की योजनाएँ बनाता रहा। इस बार उसने पूर्ण व्यवस्थित
तरीके से आक्रमण की तैयारी की। उसने अपने चचेरे भाई व दामाद इलाउद्दीन मुहम्मद बिन
कासिम की एक विशाल एवं शक्तिशाली सेना के साथ, सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा। वह
17 वर्ष का साहसी व महत्त्वाकांक्षी नवयुवक था। ईश्वरी प्रसाद के अनुसार सिंध पर मुहम्मद-बिन-कासिम
का आक्रमण इतिहास की बड़ी रोमांचकारी घटना है। विकसित यौवन, अदम्य साहस और वीरता, आक्रमण में उच्च आचरण और अंत में करुण
पतन सबने मिलकर उसके जीवन में शहीद का सा चमत्कार कर दिया है।
वह
लगभग 15,000 वीरों और बहुत से अश्वों से युक्त ऊँटों का लेकर मकरान होते हुए देवल
पहुँचा। बाद में उसकी सेना में और वृद्धि थी। सिंध पर विजय प्राप्त कर लेने के बाद
भी उसकी सेना में लगभग 50,000 सैनिक थे।
712-13 ई. में उसे सिंध पर विजय प्राप्त हो गयी। सिंधियों ने बहुत वर्षों तक संघर्ष
किया लेकिन अंततः उन्हें हार मिली। कई विद्वान् इस युद्ध का प्रमुख कारण समुद्री
डाकुओं की लूट को मानते हैं। लेकिन समकालीन स्रोतों से इसकी पुष्टि नहीं होती है।
अरबों का ध्यान भारतीयों की समृद्धि पर था। वे अपनी आर्थिक दशा को समुन्नत करना
चाहते थे। अरबों के हृदय में राजनैतिक एवं क्षेत्रीय विस्तार की महत्त्वाकांक्षा
भी आक्रमण का प्रेरक कारण बनी। इस्लाम के प्रचार की भावना ने उनके जोश व मनोबल को
बनाये रखा। प्रो. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार सिंध पर अरबों के आक्रमण के
अनेक उद्देश्य थे किन्तु धर्म का प्रचार उनका मूल उद्देश्य था।
सिंध
के शासक दाहिर की पराजय के कई कारण थे। दाहिर की सेना कासिम की सेना को देखते हुए
बहुत कम थी। उसके शासन से प्रजा के कई वर्ग असंतुष्ट थे। इस प्रकार के असंतुष्ट
व्यक्ति कासिम की सेना में भर्ती हो गये। दाहिर ने शत्रु के समक्ष मोर्चे पर
घबराहट का प्रदर्शन किया। उसने सिंध नदी के पश्चिम का भाग खाली करके पूर्वी तट से
घाटों को रोक कर बचाव की लड़ाई का प्रबन्ध किया। इस नीति से शत्रु का हौसला बढ़
गया क्योंकि उसे अनायास ही सिंध का पश्चिमी भाग प्राप्त हो गया। दाहिर को अपने
राज्य में बौद्धों, जाटों आदि के असंतोष का सामना करना पड़ा। मुहम्मद बिन कासिम स्वयं एक
कुशल सैनिक था। उसके नेतृत्व में अरब सैनिकों ने लड़ाई लड़ी। उनका मनोबल व जोश
इस्लाम की भावना के कारण और बढ़ गया था। दाहिर को प्रारंभिक युद्धों में सफलता न
मिल सकी। इसके अलावा उसके असंतुष्ट कर्मचारी मुहम्मद बिन कासिम से जा मिले। घर की
फूट व राजद्रोहियों ने अरब विजय को बहुत आसान बना दिया। उस समय भारत छोटे-छोटे
राज्यों में बंटा हुआ था। सभी अपने-अपने स्वार्थों में लिप्त रहते थे। केन्द्रीय
सरकार जैसा कोई संगठन नहीं था। सिंध की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार की थी कि वह शेष
भारत से पृथक पड़ गया था। उसे किसी प्रकार की सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। मुहम्मद
बिन कासिम ने बाद में सिंधु पार करके राबर, ब्राह्मणवाद, अलोरा, सिक्का, मुल्तान और देवल पर अधिकार कर लिया।
जनता को आतंकित करने उसने कत्लेआम किया। कहा जाता है कि उसने 17 वर्ष से ऊपर के
-पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया। ईश्वरी प्रसाद के अनुसार 6,000 का उसने वध किया
और दाहिर का समस्त कोष छीन लिया। बहुत से लोगों को इस्लाम स्वीकार कराया गया तथा
उन पर जजिया कर भी लगाया गया। मुहम्मद ने देवल के लिए एक शासक नियुक्त किया और
उसकी सहायता के लिए 4000 सैनिक नितुक्त किए। सिंध के विजेता का अंत बड़ा दुखद था।
उसे 715 ईं के लगभग यातनाएं देकर मर डाला गया। मुहम्मद बिन कासिम की मृत्यु के
भिन्न-भिन्न कारण बताये गये हैं।
मुहम्मद
बिन कासिम ने अपने दो वर्षीय शासन काल में अरब शासन व्यवस्था स्थापित करने के
प्रयास किये। मुहम्मद बिन कासिम ने प्रजा को कुछ हद तक धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान
की। ब्राह्मणों को कुछ राजकीय पद प्रदान किये गये। उन्हें जजिया तथा अन्य करों से
भी मुक्त रखा गया। उसने भूमिकर ⅓ से ⅖ तक रखा। गैर मुस्लिम लोगों को 48, 24 या 12 दिरहय (आर्थिक स्थिति के
अनुरूप) प्रति वर्ष, प्रति व्यक्ति जजिया कर के रूप में देने पड़ते थे। बच्चों, स्त्रियों आदि को इससे मुक्त रखा गया।
भारतीयों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे आगन्तुक मुसलमानों का अनिवार्य रूप से
आतिथ्य करें। जनता पर कई विशेष कर भी लगाये गये थे। लेकिन जन असंतोष विद्यमान था
और हिन्दुओं की स्थिति बहुत खराब थी। राजकीय न्यायाधिकरणों का काम हिन्दुओं से
रुपया ऐंठना और उनका बलात् धर्मपरिवर्तन कराना था। अरब निवासियों द्वारा सिंध के
शासन-प्रबन्ध में सबसे प्रमुख खटकने वाली बात यह थी कि विजेता और विजित में
सहानुभूति के उन सूत्रों का अभाव था, जो पारस्परिक विश्वास से उत्पन्न होते
हैं।
अरबों
की सिंध विजय स्थायी न रह सकी। उन्होंने जनता से बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन करवाया।
दाहिर के पुत्र जयसिंह को भी अपने पूर्वजों का धर्म छोड़ कर इस्लाम स्वीकार करना
पड़ा। 871 ई. में सिंध ने खिलाफत से अपने संबंध तोड़ दिया। लेनपूल के अनुसार- अरब
वासियों की भारतीय विजय, इस्लाम और भारत के इतिहास का एक अपूर्व अध्याय है जिसका देश पर कोई
स्थायी प्रभाव नहीं रहा।
भारतीय
परम्परा प्रेमी थे, वे विजेताओं से तालमेल न बिठा सके। राजपूतों के उदय से अरबों की विजय
को स्थायित्व मिलना कठिन हो गया। वुल्जले हेग के अनुसार- अरब विजय ने विशाल देश के
छोटे से भाग को प्रभावित किया। इसने भारतीयों का परिचय उस धर्म से करवाया जिसने
पाँच शताब्दियों तक भारतीयों को प्रभावित किया लेकिन इसके दूरगामी परिणाम नहीं
निकले।
अरब
विजय का राजनैतिक दृष्टि से अधिक महत्त्व नहीं है। यह एक ज्वार के समान था जो
इस्लाम की धारा में सिंध को डुबो गया। भारतीयों पर इसके दूरगामी प्रभाव नहीं पडे।
अरब सिंध से आगे विजय प्राप्त नहीं कर सके। गुर्जर, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजवंशों के प्रतिरोधों के
कारण वे आगे न बढ़ सके। अरबों की बहुत सी आतरिक कमजोरियाँ भी थीं। इनमें ईष्या व
धार्मिक मतभेदों का विकास होने लगा। इनकी केन्द्रीय शासन व्यवस्था क्षीण होने लगी।
अरब
भारतीयों के निकट सम्पर्क में आये, उन्होंने भारतीयों से ज्योतिष, कला, चिकित्सा के क्षेत्र में काफी कुछ
सीखा। ज्योतिष, गणित, फलित, रसायन आदि से संबंधित संस्कृत ग्रन्थों
का अरबी में अनुवाद किया गया। मसूर हज्जाज की खिलाफत (753-774 ई.) के दरबार में
भारतीय विद्वानों का आदर किया जाता था। ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मसिद्धान्त व
खण्डखाद्य अरबों में बहुत प्रसिद्ध थे। आयुर्वेद, दर्शन, ज्योतिष आदि का बहुत विकास हुआ।
हिन्दुओं की संस्कृति व विद्वता का अरबों ने भरपूर फायदा उठाया। भारतीय शिल्पियों
और चित्रकारों को मस्जिदे बनाने व उनकी सजावट करने के लिए रखा गया। अरबों ने अपनी
सभ्यता का पूर्ण विकास किया। दर्शन, ज्योतिष, गणित आदि के भारतीय ज्ञान को उन्होंने
यूरोप में पहुँचाया। भारतवर्ष में भी अरबों के आगमन से एक नये धर्म का प्रवेश हुआ।
इसने कालान्तर में भारतीयों पर व्यापक प्रभाव डाला। सिंध विजय के राजनैतिक प्रभाव
तो प्रभावहीन रहे लेकिन इसके सांस्कृतिक प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता।
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