गुप्तकालीन राजनीतिक व्यवस्था || Gupta Empire Political System
गुप्तों का शासन राजतंत्रात्मक व्यवस्था पर आधारित था। शासन का सर्वोच्च अधिकारी सम्राट था।
सम्राट व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका तीनों का प्रमुख था।
गुप्त काल में दैवीय उत्पत्ति का सिद्धांत मान्य था, परन्तु यह पूर्वकाल की तरह लोकप्रिय नहीं रह गया था।
राजपद वंशानुगत था, परन्तु राजकीय सत्ता ज्येष्ठाधिकार की प्रथा के आभाव के कारण सीमित थी।
गुप्तों की शासन व्यवस्था पूर्णतया मौलिक नहीं थी। उसमें मौर्यों, सातवाहनों, शकों तथा कुषाणों के प्रशासन की विधियों का समावेश था।
केन्द्रीय प्रशासन
केन्द्रीय प्रशासन का जो नियंत्रण मौर्य काल में देखने को मिलता है, वह गुप्त काल में नहीं मिलता है।
राजा की सहायता के लिए केन्द्रीय स्तर पर मंत्री और अमात्य होते थे।
मंत्रियों का चयन उनकी योग्यता के आधार पर किया जाता था।
कामन्दक और कालिदास दोनों ने मंत्रिमंडल या मंत्रिपरिषद का उल्लेख किया है।
कामन्दक नीतिसार में मंत्रियों और अमात्यों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है।
कात्यायन स्मृति में इस बात पर जोर दिया गया है कि अमात्यों की नियुक्ति ब्राह्मण वर्ग में होनी चाहिए।
गुप्त साम्राज्य के सबसे बड़े अधिकारी कुमारामात्य होते थे।
सम्राट द्वारा जो क्षेत्र स्वयं शासित होता था। उसकी सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई देश थी। देश के प्रशासक को ‘गोप्ता’ कहा जाता था। जूनागढ़ अभिलेख में में सौराष्ट्र को एक ‘देश’ कहा गया है।
साम्राज्य का केन्द्रीय प्रशासन अनेक विभागों में विभक्त था, जिसका उत्तरदायित्व विभिन्न अधिकारीयों को सौंपा गया था।
केन्द्रीय शासन के विविध विभागों को ‘अधिकरण’ कहा जाता था। प्रत्येक अधिकरण की अपनी मुद्रा होती थी। केन्द्रीय अधिकारियों को नकद वेतन दिया जाता था।
प्रांतीय शासन
शासन की सुविधा के लिए गुप्त साम्राज्य को विभिन्न प्रान्तों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘मुक्ति’ कहा जाता था।
प्रांतीय शासकों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी, जिन्हें उपरिक, गोप्ता, मोगपति तथा राजस्थानीय कहा जाता था।
प्रांतीय शासन के समस्त कार्यों का उत्तरदायित्व प्रांतीय शासक पर होता था। उनके उत्तरदायित्व केंद्र के शासकीय पदाधिकारियों के सामानांतर थे।
उप्रिकों की नियुक्ति सम्राट द्वारा की जाती थी। इस पद पर राजदुल के कुमारों की नियुक्ति की जाती थी।
प्रांतीय शासन के कई अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का भी उल्लेख मिलता है। ‘बलाधिकराजिक’ सैनिक कोष का अधिकारी था।
‘विनयस्थिति स्थापक’ विधि एवं व्यवस्था मंत्री था। ‘अटाश्वपति’ पैदल और घुडसवार सेना का अधिपति था। जबकि ‘महापिल्लुपति’ हाथी सेना का अधिकारी था।
जिला प्रशासन
नियुक्तियों का विभाजन अनेक जिलों में किया गया था। इन जिलों को विषय कहा जाता था। इसकी नियुक्ति उपरिक द्वारा की जाती थी।
विषयपति की सहायता एवं परामर्श देने के लिए एक विषयपरिषद् होती थी, जिसकी नियुक्ति प्रायः पांच वर्ष के लिए की जाती थी।
विषय परिषद् के सदस्य विषय महत्व कहलाते थे। इनमें सार्थवाह, प्रथम कुलिक और प्रथम कायरथ शामिल थे।
स्थानीय प्रशासन
गुप्त साम्राज्य में स्थानीय प्रशासन को दो भागों में बांटा गया था- 1. नगर प्रशासन 2. ग्राम प्रशासन।
नगर प्रशासन के प्रमुख पदाधिकारियों को पुरपाल, नगरअक या द्रांगिक कहा जाता था। यह नगर परिषद् की सहायता से समस्त समस्त नागरिक सुविधाओं तथा सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होता था।
नगर परिषद् के प्रमुख को ‘नगरपति’ कहा जाता था। अवस्थिक नामक कर्मचारी धर्मशालाओं के पर्यवेक्षक के रूप में कार्य करते थे।
गुप्त काल में ग्राम, प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी। प्रत्येक विषय के अंतर्गत कई ग्राम होते थे।
ग्राम और विषय के मध्य एक और इकाई के अस्तित्व का साक्ष्य मिलता है। इसे ‘पेय’ कहा जाता था। पेय कई ग्रामों का एक समूह था।
ग्राम प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी ग्रामपति या ग्रामिक था। उसकी सहयता के लिए एक ग्राम पंचायत थी।
इस ग्राम सभा को मध्य भारत में ‘पंचमजुली’, तथा बिहार में ग्राम जनपद कहा जाता था।
न्याय व्यवस्था
गुप्त काल में न्याय व्यवस्था का समुचित प्रबंध किया गया था।
गुप्तकाल में न्यायालय के चार वर्ग थे- 1. राजा का न्यायालय 2. पूग 3. श्रेणी 4. हुल।
दण्डविधान कठोर था।दण्डनायक, सर्वदण्डनायक और महादण्डनायक न्यायाधीश थे।
निम्न स्तर पर न्यायिक मामलों का निपटारा समिति, परिषदें तथा संस्थाएं भी करती थीं।
मंत्री और पुरोहित भी न्यायायिक मामलों में सहायता करते थे।
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