महावीर के सिध्दांत एवं शिक्षाएं ||
जैन धर्म के संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है और विद्वानों का मत है
कि जैन धर्म का उद्भव छठी शताब्दी ई.पू.
से पहले ही
हो चूका था.
किन्तु जैन धर्म का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार जैन धर्म के चौबीसवे और
अंतिम तीर्थकर महावीर स्वामी के काल में हुआ. यही कारण है कि
महावीर स्वामी ने
जिन सिध्दांतों का
प्रचार किया वे
ही जैन धर्म के सिध्दांत स्वीकार किए जाने लगे महावीर स्वामी ने
जिन सिध्दांतों का
निर्धारण जैन धर्म के अनुयायियों के
लिए किया, वे
निम्नवत है-
अनिश्र्वरदिता
महावीर स्वामी का
ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नही था. उन्होंने न
तो ईश्वर को
संसार का रचयिता माना और न
ही नियंत्रक. उनका विश्वास था कि
सृष्टि तो अनादि और अनंत है.
इसमें (सृष्टि ) परिवर्तन तो होते रहते है किन्तु विनाश कभी नहीं हुआ. सृष्टि का निर्माण है
द्रव्वों,आकाश,काल,धर्म, अधर्म,पुद्गल,व जीव से
हुआ है.
आत्मवादिता तथा अनेकात्मवादिता
जिस प्रकार ब्राहमण धर्म में आत्मा की अमरता को
स्वीकार किया गया है, उसी प्रकार जैन धर्म में आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है. महावीर स्वामी के अनुसार आत्मा सुख-दुःख का अनुभव करती है तथा प्रकाश के समान अस्तित्व, किन्तु आत्मा का कोई आकार नही होता है. प्रत्येक जीव-जंतु में अलग अलग आत्मा होती है. आत्मा का
वास पेड़-पौधों में भी होता है. महावीर स्वामी के अनुसार आत्मा स्वभाव से निर्विकार एवं सर्व द्रष्टा है.
निर्वृति की प्रधानता
जैन धर्म में निवृत्ति की प्रधानता पर बल दिया गया है. यह
संसार दुखों से
परिपूर्ण है और
दुःख का प्रमुख कारण तृष्णा है.
तृष्णा मार्ग के
अनुसरण से ही
मनुष्य का कल्याण संभव है. अत:
प्रत्येक व्यक्ति को
सांसारिक सुखो का
त्याग कर निवृति मार्ग का अनुसरण करना चाहिए.
कर्म की प्रधानता और पुनर्जन्म में विश्वास
जैन धर्म में कर्मो को प्रधानता दी गयी है
तथा पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त किया गया है. पुनर्जन्म अथवा आवागमन का
सिध्दांत मनुष्यों के
कर्म कर आधारित है. कर्म के
आधार पर ही
मनुष्य का अगला जन्म होता है.
कर्मानुसार ही मनुष्य की अगले जन्म में आयु निर्धारण होती है.अत:
मनुष्य को सदेव सत्कर्म करने चाहिए जिससे मोक्ष प्राप्ति हो सके.
मोक्ष अथवा निर्वाण
हिन्दू एवं बौद्ध धर्म की भांति जैन धर्म में भी मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्ति को
परम लक्ष्य माना गया है. मोक्ष के सम्बन्ध में जैन धर्म का
मत है कि
कर्म बंधन की
मुक्ति से मोक्ष अथवा निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है. कर्म बंधन से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को वर्तमान जन्म में सत्कर्म करने चाहिए ताकि उसके पूर्व जन्म के
दुष्कर्मों का नाश हो जाए. यदि मनुष्य ऐसा करता है तो उसका ज्ञान अनंत, असीम तथा विशुद्ध हो
जाता है और
वह भौतिक तत्वों के मोह पाश से छुटकारा पा
लेता है. जीवन की इसी अवस्था को निर्वाण कहा जाता है. निर्वाण प्राप्ति के लिए जैन धर्म त्रिरत्न को आवश्यक बताया गया है.
जैन धर्म के त्रिरत्न
कर्मफल से छुटकारा पाने तथा निर्वाण हेतु जैन धर्म में “त्रिरत्न” को
आवश्यक बताया गया है. यदि मनुष्य त्रिरत्नों का पालन करता है तो
वह निश्चय ही
मोक्ष प्राप्त कर
लेगा. ये त्रिरत्न है-
1.सम्यक ज्ञान- सच्चा और पूर्ण ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है. कुछ लोगों में तो यह
स्वभावत ही विद्यमान होता है तथा अन्य लोग अभ्यास और विद्योपार्जन द्वारा इसकी प्राप्ति कर
सकते है. अत:
प्रत्येक व्यक्ति को
चाहिए कि वह
जैन तीर्थकरों के
उपदेशों का अध्ययन कर अनुसरण करे.
2.सम्यक दर्शन- यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा को ही
जैन धर्म में सम्यक दर्शन कहा गया है.
3.सम्यक आचरण- सम्यक आचरण से आशय है कि मनुष्य को इन्द्रियों के
वशीभूत न होकर सदाचारी जीवन व्यतीत करना चाहिए. इसके लिए आवश्यक है
कि वह सत्य, अहिंसा तथा ब्रहमचर्य का
पालन करे.
जैन धर्म के अठारह पाप
जैन धर्म में अठारह पापों का
उल्लेख किया गया है. इन पापों से मनुष्य कर्म बंधन में फँसता है. ये पाप है-
1.झूठ
2.चोरी
3.मैथुन
4.क्रोध
5.हिंसा
6.द्रव्य मूर्छा
7.लोभ
8.माया
9.मान
10.मोह
11.कलह
12.द्वेष
13.दोषारोपण
14.चुगली
15.निंदा
16.असंयम
17.माया मृशा (कपटपूर्ण झूठ )
18.मिथ्या दर्शन रूपी शल्य
जैन धर्म के पञ्च महाव्रत
महावीर स्वामी ने
जैन भिक्षु –भिक्षुणियों को पंच महाव्रतों के पालन का
उपदेश दिया. इन
पञ्च महाव्रतों- अहिंसा, अमृषा (सत्य), अचौर्य (अस्तेय), अपरिगृह, ब्रह्मचर्य. प्रथम चार महाव्रतों का
प्रतिपादन तेइसवे तीर्थकर पार्श्वनाथ एवं चौबीसवे तीर्थकर महावीर स्वामी ने किया.
1.अहिंसा
मन, कर्म तथा वचन से किसी के प्रति ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे उसे दुःख अथवा कष्ट हो अर्थात किसी को शब्द्घात नहीं पहुँचाना चाहिए, साथ ही कोई भी
ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे किसी पशु, पक्षी, पेड़-पौधों को किसी प्रकार का कष्ट हो.
2.अमृषा (सत्य)
मनुष्य को सदेव मधुरता से बोलते हुए सत्य बोलना चाहिए. इसके लिए क्रोध और भय
के समय मौन रहना चाहिए. बिना विचारे बोलना नहीं चाहिए.
3.अचौर्य (अस्तेय)
बिना स्वीकृति लिए किसी की भी
वस्तु अथवा धन
नहीं लेना चाहिए. बिना अनुमति के न
तो किसी के
घर में प्रवेश करना चाहिए और
न ही रहना चाहिए.
4.अपरिगृह
भौतिक वस्तुओ का
त्याग करना चाहिए तथा सम्पति का
संग्रह नही करना चाहिए.
5.ब्रह्मचर्य
भोग वासना से
दूर रहकर संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए ब्रह्मचर्य के
अंतर्गत किसी स्त्री को न तो
देखना चाहिए और
न ही उससे वार्तालाप करना चाहिए. जिस घर में स्त्री का वास हो
वहां नहीं रहना चाहिए और स्त्री सम्भोग का तो
कतई ध्यान भी
नही करना चाहिए.




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